दुनिया की शुरुआती सभ्यताओं में छुपा है, घड़ी की उल्टी दिशा में घूमती सुइयों का राज़

दुनिया में एक चीज़ है, जो कभी किसी के लिए नहीं रुकती है. जो पहले भी था, आज भी है और कल भी रहेगा. अरे बाबा अभी भी नहीं समझे. आज बात हो रही है उस वक्त की, जो अगर इंसान की ज़िन्दगी में अच्छा हो, तो सब अच्छा और बुरा हो, तो फिर तो पूछो ही मत. धीरे-धीरे मोबाइल ने आकर चाहे आपके हाथ से घड़ी को छीन लिया हो, मगर आज भी घर की दीवारों पर यह शान से टंगी नज़र आ जाती है. आपने उस घड़ी को निहारते हुए कभी न कभी ये ज़रूर सोचा होगा कि यार ये हमेशा उल्टी दिशा में ही क्यों घूमती है, पर अभी तक जवाब नहीं जानते ना. चलो कोई बात नहीं, आज हम बताए दे रहे हैं, पर दोबारा मत पूछना.


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हमारे देश में पुराने समय से ही अलग-अलग पहर के हिसाब से समय का अंदाज़ा लगाया जाता था. उस समय दिन को आठ पहर में बांटा गया था. जो आज भी हिन्दू धर्म में माना जाता है. औसतन देखा जाये तो, हर एक पहर में लगभग 3 घंटे होते हैं. इसके अलावा घटी से हिसाब से देखा जाये, तो एक पहर में साढ़े सात घटी माने जाते हैं. एक घटी 24 मिनट का होता है. चार पहर दिन के और इसी तरह चार पहर रात में होते हैं. हर एक पहर में दो मुहूर्त भी होते हैं. यह समय को मापने की अवधारणा चांद और सूरज की गति पर आधारित थी.


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समय की गणना करने का यह तरीका पूरी तरह देसी हुआ करता था. सारे काम-काज इसी के अनुरूप हुआ करते थे. इसके लिए किसी घड़ी की भी ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई. समय के साथ दुनिया में जब घड़ी का पदार्पण हुआ, तो हमारे यहां सौर घड़ी का जन्म हुआ.


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हमारे यहां सूर्य की गति के साथ-साथ चंद्र की गतियों का भी समय को मापने में बराबर उपयोग किया गया. जैसे कि मान लो उजाले पक्ष की चौथ है, तो सूर्य ग्रहण होने की स्थिति में उसके चौथे घंटे बाद चांद दिखता है. इसी तरह अष्टमी को पूरे आठ घंटे बाद आपको चांद का दीदार हो जाता है. यह घंटों की गणना करने का तरीका इतना सटीक होता है कि हमारे यहां आज भी चंद्र और सौर पंचांगों की गणना को माना जाता है.


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समय के साथ पाश्चात्य संस्कृतियों के सम्पर्क में आने पर हम घड़ियों की तरफ़ बढ़े. जानकारों का कहना है कि पुराने समय में अधिकांश सभ्यताएं उत्तरी गोलार्ध में पनपी थीं. जब उन्होंने समय की गणना करने के लिए घड़ी का आविष्कार किया तो उत्तरी गोलार्ध में अपनी अवस्थिति की वजह से उन्होंने यह क्लॉक वाइस सिस्टम बनाया, जिसमें की घड़ी की सुइयां पश्चिम से पूरब की ओर घूमती हैं. यदि उस समय लोग पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्ध में रह रहे होते तो शायद घड़ी के घूमने की दिशा कुछ और होती.

घड़ियों की घूमने की दिशा को लेकर काफ़ी सॉलिड वाली बातें हो गयीं, अब जाइये और कुछ काम कर लीजिए, जिससे आने वाला टाइम भी सॉलिड हो जाये.

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